एक जूनून कुछ कर दिखाने का | Just Do It | Successful Story

एक जूनून कुछ कर दिखाने का | Just Do It

प्रिय दोस्तों आज में आप सभी को एक स्टोरी सुनाना चाहता हूं यह Successful स्टोरी पढने के बाद आपके जीवन में बहुत बड़ा बदलाव आने वाला है। तो चलिए शूरु करते है । लंच रूम में काफी चहल-पहल और गहमागहमी थी। उस सुबह, जो कुछ श्रोताओं ने सीखा था, उसकी चर्चा में मशगूल लोगों के बीच मुख्य बिंदु यही था कि लक्ष्य की निश्चितता हासिल करना महत्त्वपूर्ण है, जो किसी भी प्रतिबद्ध व्यक्ति को उपलब्धि के रास्ते पर ला देगा।

दोपहर के सत्र में Success की और भी उत्साहवर्द्धक चाबियाँ देने का वायदा किया गया था, इसलिए लगभग सब-के-सब नोट्स लेने की तैयारी करके दुबारा जुट गए। जब वे सेमिनार हॉल में लौटे तो एक टेबल पर हाथ से लिखे नोटकार्ड को देखकर सबको बड़ा आश्चर्य हुआ।

सेमिनार में भाग ले रहे सभी लोगों के नाम प्रत्येक नोटकार्ड के किनारे पर लिखा था- “कुछ आगे तक कर गुजरें और अपने लिए तथा औरों के लिए भी बहुआयामी इनाम सुनिश्चित करें।” उस पर किसी के दस्तखत नहीं थे, पर सभी जानते थे कि यह किसकी ओर से भेजे गए हैं।

वे इस बात से प्रभावित हुए कि वक्ता ने हर व्यक्ति का नाम लिखने का समय निकाला। वक्ता की इस विशिष्ट छवि ने सभी श्रोताओं को यह जानने को ज्यादा उत्सुक कर दिया कि अगले motivation law में वे क्या शेयर करते हैं।

श्रोताओं के अपनी सीटों पर बैठ जाने के बाद वक्ता परदा हटाकर बाहर निकले। उन्होंने पूरे हॉल पर नजर दौड़ाकर एक व्यापक मुसकान बिखेरी और पूरे उत्साह के साथ श्रोताओं की ओर मुखातिब हुए—जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में और हर व्यवसाय में Success का एक महत्त्वपूर्ण motivation law है, कुछ आगे तक कर गुजरने की इच्छा।

इससे ज्यादा बेहतर सेवा का अवसर मिलता है, जिसके लिए आप पैसे लेते हैं और अनुकूल मानसिक वृत्ति भी हासिल होती है। इस motivation law के खिलाफ एक भी ठोस तर्क आप ढूँढेंगे, तो नहीं मिलेगा।

ऐसा भी कोई उदाहरण नहीं मिलेगा कि इस motivation law पर चलनेवाले किसी को आशा के अनुरूप Success नहीं मिली हो। यह motivation law मानवनिर्मित नहीं, बल्कि प्रकृति के काम का एक हिस्सा है। यह बिलकुल स्पष्ट बात है कि प्रत्येक जीवधारी को अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए इस motivation law को अपनाना पड़ता है।

बहुत लोग चाहें तो इस motivation law को न मानें, पर वे ऐसा नहीं कर सकते और साथ ही इसकी Success का भी लाभ उठाते हैं। सोचें कैसे, प्रकृति इस motivation law के तहत मिट्टी से फसल उपजाती है।

किसान को उसके लिए आगे तक कर गुजरना होता है, वह जमीन का जंगल साफ कर जोतता है, साल के सही समय में बीज बोता है और इसमें से किसी काम के लिए उसे अग्रिम वेतन नहीं मिलता।

गौर करें कि अगर वह प्रकृति के नियमों के साथ सामंजस्य रखकर अपना जरूरी श्रम करता है, तो प्रकृति वहाँ से सँभाल लेती है, जहाँ उसकी मेहनत समाप्त होती है। प्रकृति बीज को पौधे के रूप में विकसित करती है।

इस यथार्थ पर ज्यादा गौर करें कि किसान द्वारा बोए गए प्रत्येक बीज के बदले प्रकृति सौ-सौ दाने देती है  प्रकृति कुछ आगे तक जाकर अपनी जरूरत से ज्यादा हर चीज पैदा करती है, जो इमरजेंसी में भी काम आती है और बरबाद भी होती है।

उदाहरण के तौर पर, वृक्ष में फल, उसके पहले फूलों के बीज और तालाब में मेंढक तथा समुद्र में मछली। अगर यह सत्य न हो, तो सारे जीव विलुप्त हो जाएँगे। कुछ लोग मानते हैं कि जंगल में रहनेवाले पशु-पक्षी बिना काम किए जीते हैं, लेकिन विचारवान लोग जानते हैं कि यह बात सही नहीं है।

प्रकृति ने सभी प्राणियों के लिए भोजन के स्रोत मुहैया कराए हैं, मगर प्रत्येक जीव को खाने के लिए मेहनत करनी होती है। इस प्रकार प्रकृति वैसी आदत को प्रश्रय नहीं देती कि कुछ भी नहीं के लिए, कुछ हासिल करने का प्रयास किया जाए।

कुछ आगे तक कर गुजरने की आदत के फायदे निश्चित और समझ में आने लायक हैं। उनमें से कुछ आप यहाँ देखें और स्वयं निश्चित हो लें।

1. यह आदत व्यक्ति को वैसे लोगों के करीब लाती है, जो आत्म-विश्वास के अवसर उपलब्ध करा सकते हैं।

2. इससे व्यक्ति कई तरह के मानवीय संबंध बना सकता है, जो लंबे समय तक कायम रखे जा सकते हैं। इससे व्यक्तिगत सेवाओं के लिए औसत से ज्यादा मुआवजा माँगा जा सकता है। यह मानसिक स्तर बढ़ाती है और शारीरिक हुनर प्रदान करती है। इससे उद्यम के कई रूपों में पूर्णता हासिल होती है, जिससे कमाई की क्षमता बढ़ती है।

3. रोजगार की किल्लत के समय भी यह रोजगार से वंचित होने से बचाती है और व्यक्ति को अच्छी नौकरी की कमांडवाली स्थिति में ला देती है। यह व्यक्ति को उतना लाभवाली बनाती है, ताकि नजर में आ जाए, क्योंकि अधिकांश व्यक्ति ऐसी आदत अपनाने का अभ्यास नहीं करते।

4. यह सार्थक मानसिक वृत्ति का Success करती है, जो Success के लिए आवश्यक है।

5. इससे एलर्ट और तत्पर कल्पना का Success होता है, क्योंकि ऐसी आदत से लगातार बेहतर सेवा के नए तथा बेहतर तरीके तलाशने की प्रेरणा मिलती है।

6. यह आत्म-निर्भरता और हौसला विकसित करती है।

7. इससे व्यक्ति के अंदर वैसी कार्यक्षमता और लगन निर्मित होती है, ताकि दूसरों को उससे विश्वास जगे।

8. यह व्यक्ति को ढुलमुल रवैयेवाली अनिर्णय की विनाशकारी आदत मिटाने में मदद करती है। यह लक्ष्य की निश्चितता विकसित करती है और लक्ष्यहीनता की सामान्य आदत से बचाती है।

9. कुछ आगे तक कदम बढ़ाने की आदत डालने के पीछे एक अन्य बड़ा कारण यह है कि यह एकमात्र ऐसा तार्किक कारण है, जिसके चलते व्यक्ति मुआवजा बढ़ाने की बात करता है।

10. अगर कोई कर्मचारी को, जितने काम के पैसे मिलते हैं, वह उससे ज्यादा नहीं करता, तो इसका मतलब उसे उतना ही बहुत मिल जाता है। उस कर्मचारी को अवश्य ही अपनी नौकरी बचाने के लिए वेतन के अनुपात के मुकाबले ज्यादा काम करना चाहिए, लेकिन व्यक्ति को ज्यादा वेतन, बेहतर पद और ज्यादा वेतन की माँग उचित ठहराने के लिए हमेशा ज्यादा काम करना चाहिए।

यह सद्भावना हासिल करने का भी एक जरिया है। कुछ आगे तक कर गुजरना कैसे जुड़ा है बारह उपायों से धनकुबेर बनने की चाहत रखनेवालों के लिए  dale carnegie ने जो सत्रह दर्शन motivation law बताए हैं, उनमें से सिर्फ एक है कुछ आगे तक कर गुजरने की आदत।

आइए, देखें कि किस प्रकार यह सीधे तौर पर बारह धनकुबेर उपायों से जुड़ी है। पहला तो यह कि यह आदत धनकुबेर के बारह उपायों में से सबसे महत्त्वपूर्ण पॉइंट के Success से जुड़ी है और वे है अनुकूल मानसिक मनोवृत्ति।

जब कोई व्यक्ति अपनी भावनाओं पर मास्टरी करके दूसरों के लिए उपयोगी सेवाओं के माध्यम से आत्म-अभिव्यक्ति की कला सीख लेता है, तो वह अनुकूल मानसिक मनोवृत्ति Success के मार्ग में काफी आगे तक निकल जाती है।

अनुकूल मानसिक मनोवृत्ति उचित विचार पैटर्न की निर्मात्री है और बारह धनकुबेर उपाय उसी पैटर्न पर ऐसे टिके हैं, जैसे प्राकृतिक रूप से रात और दिन एक-दूसरे से जुड़े हैं।

इस सत्य को पहचानें और आप समझ जाएँगे कि आगे तक कर गुजरने की आदत से किस प्रकार भौतिक संपत्तियों के जमा करने से आगे तक का फायदा मिलता है, फिर आप ये भी जान जाएँगे कि  dale carnegie द्वारा बताए गए व्यक्तिगत Success दर्शन में इस motivation law को पहला स्थान क्यों दिया गया है।

अब जरा हम यह देखें कि जितनी सेवा के लिए पैसे मिलते हैं, उससे ज्यादा और बेहतर की तलब में विरोधाभास है, क्योंकि किसी व्यक्ति के लिए उचित मुआवजा पाए बिना ऐसी सेवा अर्पित करना असंभव है। मुआवजे कई तरह से दिए जा सकते हैं और विभिन्न स्रोतों से आ सकते हैं, जिनमें से कुछ विचित्र तथा उम्मीद से अलग स्रोत हो सकते हैं, लेकिन जो भी हो, मिले जरूर।

ऐसा भी हो सकता है कि इस तरह की सेवा अर्पित करनेवाले श्रमिक को उस व्यक्ति से उचित मुआवजा न मिले, जिसका काम कर रहा है, मगर यह आदत उसके लिए आत्म- Success के कई अवसर लाएगी। जिनमें नए और ज्यादा बेहतर रोजगार के स्रोत होंगे।

इस तरह उसका वेतन अप्रत्यक्ष रूप से मिलेगा। राल्फ वाल्डो एमर्सन के दिमाग में यह सत्य था, जब उसने (मुआवजे से संबंधित अपने लेख 1841 के बारे में) कहा था। अगर आप कृतघ्न मालिक की सेवा करते हैं, तो उसकी खूब सेवा करें और भगवान् को अपना ऋणी बनाएँ।

प्रत्येक दौरे का पुनर्भुगतान होगा। लंबे समय तक भुगतान का सिलसिला चलता रहेगा और तुम्हारी भलाई के लिए एकमुश्त सूद-पर-सूद बढ़ता जाएगा, जो इस खजाने की दर तथा उपभोग है। विरोधामासवाले मुद्दे पर दुबारा आकर मैं यह याद दिलाना चाहता हूँ कि किसी के लिए भी श्रम का वही समय फायदेमंद है, जिसके एवज में वो तात्कालिक या सीधा वित्तीय मुआवजा नहीं लेता। स्मरण रहे, वेतनभोगियों के लिए दो प्रकार का मुआवजा उपलब्ध है -एक तो वह है, जिसका भुगतान पैसे में होता है।

दूसरा वह हुनर है, जो अनुभव से हासिल होता है। यह एक प्रकार का मुआवजा है, जिससे प्रायः वित्तीय भुगतान बढ़ जाता है। दूसरे अर्थों में हुनर और अनुभव सबसे महत्त्वपूर्ण स्टॉक तथा व्यापार है, जिसके जरिए ज्यादा वेतन के साथ-साथ ज्यादा बड़ी जवाबदेही भी मिलती है।

यह ऐसी संपत्ति है, जो किसी कामगार को धोखा नहीं दे सकती। उसका मालिक चाहे कितना भी लालची या स्वार्थी हो, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। यह एकमुश्त सूद पर एकमुश्त सूद है, जिसका एमर्सन ने जिक्र किया है। इसी संपदा की बदौलत चार्ल्स एम. शुआब एक-एक सीढ़ी चढ़ते गए। उन्होंने शुरुआत एक मामूली दिहाड़ी मजदूर से की और उनके मालिक ने उन्हें सबसे ऊँचा पद दिया।

इसी संपत्ति के चलते शुआब ने अपने वेतन का दस गुना ज्यादा बोनस पाया। शुआब को लाखों डॉलर बोनस इसलिए मिला, क्योंकि जो भी काम उन्हें दिया गया, उसे पूरी लगन से किया और उसे बेहतर बनाने के अपने प्रयासों में कोई कमी नहीं होने दी।

एक परिस्थिति सामने थी, जिसे उन्होंने पूरा नियंत्रण में रखा। हम याद करते चलें कि अगर शुआब ने कुछ आगे तक कर गुजरने की आदत का पालन नहीं किया होता, तो वैसी परिस्थिति नहीं बन पाती। हम यहाँ नोट करते चलें कि इस तरह कुछ आगे बढ़कर काम करने की आदतवाले अपनी सेवाओं के खरीदार को फकत मुआवजा देने के दोतरफा दायित्व से बाँध देते हैं।

एक तो ईमानदारी से काम करने की मनोवृत्ति पर आधारित दायित्व होता है और दूसरा एक मूल्यवान कर्मचारी से वंचित होने के डर पर आधारित दायित्व होता है। हम यह भी समझें कि एक महान् औद्योगिक नेता के मन में क्या बात रही होगी, जब उसने कहा—“मैं व्यक्तिगत रूप से 40 घंटे प्रति सप्ताह न्यूनतम श्रम कानून के पक्ष में नहीं हूँ, क्योंकि मेरा मानना है कि एक ही दिन में 40 घंटों की भीड़ कैसे जुटाई जा सकती है।”

इसी व्यक्ति ने यह भी कहा—“अगर मुझे उपलब्धि के 17 सिद्धांतों में से एक पर Success की उम्मीद का जोखिम उठाने की मजबूरी हो, तो बिना किसी हिचकिचाहट के कुछ आगे तक जाने के motivation law पर सारे दावे ठोकूँगा।” सौभाग्य से उसने इस पसंद का दायित्व नहीं लिया, जबकि व्यक्तिगत उपलब्धि के सत्रह motivation law आपस में एक-दूसरे से कड़ी की तरह गुंथे हैं।

अतः ये सब आपसी समन्वय से महान् शक्ति का जरिया बनते हैं। इनमें से एक के भी छूट जाने से शक्ति कमजोर होती है ठीक वैसे ही, जैसे एक कड़ी हटा देने से जंजीर कमजोर हो जाती है।

इनमें से हर motivation law के इस्तेमाल से एक निश्चित अनुकूल दिमागी गुणवत्ता हासिल होती है और वैचारिक शक्ति द्वारा पैदा की गई हर परिस्थिति सिद्धांतों के उपयोग को बाध्य करती है। ये सत्रह motivation law शब्दबोध करानेवाले 26 अक्षर कहे जा सकते हैं, जो एक साथ मिलकर सारे मानवीय विचारों को अभिव्यक्ति प्रदान करते हैं।

अक्षरमाला का एक अक्षर अपने आप में कोई अर्थ नहीं रखता, लेकिन वे मिलकर जब शब्द बनते हैं, तो उसके माध्यम से मन के विचार वाक्य बनकर व्यक्त होते हैं। ये सत्रह motivation law व्यक्तिगत उपलब्धि की अक्षरमाला हैं, जिनके जरिए सारी योग्यताएँ सर्वाधिक ऊँचे और लाभप्रद रूप में व्यक्त की जा सकती हैं।

ये धनकुबेर की महान् चाबी हासिल करने के साधन भी बन सकते हैं। कुछ लोग जो कुछ आगे तक कर गुजरने की आदत से लाभान्वित हुए, उनमें से किसी का काम आज तक बिना परिणाम के संपन्न नहीं हुआ।

अभी हम वैसे कुछ परिणामों का जायजा लें, जो आगे तक कर गुजरने की आदत से प्रेरित होने के बाद सामने आए और सही साबित हुए। कई वर्ष पूर्व पिट्सबर्ग डिपार्टमेंटल स्टोर में खरीदारी करने पहुँची एक बुजुर्ग महिला समय काट रही थी। वह इस काउंटर से उस काउंटर घूम रही थी और कोई उसकी ओर ध्यान नहीं दे रहा था।

सारे काउंटर क्लर्कों की नजर में वह एक सुस्त महिला थी, जिसका कुछ खरीदने का इरादा नहीं था। वह महिला जब किसी काउंटर के सामने खड़ी होती, वहाँ मौजूद क्लर्क दूसरी तरफ देखने लगता। आखिर वह एक काउंटर के सामने खड़ी हुई, जहाँ ड्यूटी कर रहे एक युवा क्लर्क ने विनम्रता से पूछा कि वह उनकी कोई सेवा कर सकता है? “नहीं”, उसने जवाब दिया—“मैं सिर्फ समय काट रही हूँ, बारिश रुकने का इंतजार कर रही हूँ, ताकि मैं घर जा सकूँ।”

“बहुत अच्छा मैडम”, युवक मुसकराया, “क्या मैं आपके लिए एक कुरसी ले आऊँ?” और महिला के जवाब की प्रतीक्षा किए बिना, युवक कुरसी ले आया। बारिश थमने के बाद युवक ने उस बुजुर्ग महिला को बाँहों का सहारा देकर उठाया और सड़क तक ले जाने के बाद गुड बाई करके विदा किया।

आने से पहले महिला ने उस युवक से कार्ड माँग लिया। महीनों बाद स्टोर के मालिक को एक पत्र मिला, जिसमें उस युवक को एक मकान की सजावट का ऑर्डर लेने स्कॉटलैंड भेजने को कहा गया था। स्टोर मालिक ने जवाब दिया कि सॉरी, इस युवक ने घर फर्निशिंग विभाग में काम नहीं किया है और साथ में यह भी बताया कि इस काम के लिए किसी अनुभवी व्यक्ति को भेजकर उन्हें खुशी होगी। उसके बाद फिर जवाबी पत्र आया कि इस युवक को छोड़ दूसरा कोई भी यह काम नहीं करेगा, उन पत्रों पर एंड्रयू  dale carnegie के हस्ताक्षर थे और जो घर उससे फर्निशिंग करवाना चाहते थे, वह स्कॉटलैंड में स्किवो महल था। वह बुजुर्ग महिला  dale carnegie की माँ थी। उस युवक को स्कॉटलैंड भेज दिया गया।

युवक को सैकड़ों हजार मूल्य के मकान फर्निशिंग ऑर्डर मिले और स्टोर में पार्टनरशिप भी मिली। बाद में वह स्टोर के आधे हिस्से का मालिक बना। कुछ वर्ष पूर्व एक पत्रिका के संपादक ने डेबेनपोर्ट के एक कॉलेज में छात्रों को संबोधित करने के लिए अपने पत्रम-पुष्पम और यात्रा-व्यय पर न्योता स्वीकार कर लिया।

कॉलेज में जितना समय संपादक ने गुजारा, उस दौरान उन्हें कई ऐसी स्टोरी का मसाला मिल गया, जो वे खोज रहे थे। संपादक को जब यात्रा खर्च और पत्रम-पुष्पम दिया जाने लगा, तो उन्होंने यह कहकर लेने से इनकार कर दिया कि उन्हें कई स्टोरी के रूप में भुगतान मिल गया है, जो लिखनी हैं।

संपादक ने शिकागो की ट्रेन पकड़ी और यह सोचकर संतुष्ट थे कि इस दौरे का उन्हें बहुत भुगतान मिला। शुल्क लेने से उनके इनकार कर देने की खबर पत्रकारिता के उन छात्रों तक पहुँच गई, जिनको संबोधित करने वे गए थे और जो रियल लाइफ पत्रकारिता का एक उदाहरण था।

अगले हफ्ते से डेवेनपोर्ट से उनकी पत्रिका के लिए चंदे आने लगे और हफ्ता गुजरते-गुजरते उन्होंने हजारों डॉलर नकद चंदे के रूप में प्राप्त किए। उसके बाद संपादक को कॉलेज के अध्यक्ष ने पत्र लिखकर बताया कि ये सारे चंदे उनके छात्रों की ओर से भेजे गए।

दो साल के अंदर उस कॉलेज के छात्रों और स्नातकों ने उस युवा संपादक की पत्रिका के लिए 50,000 डॉलर से ज्यादा चंदे भेजे। यह स्टोरी इतनी प्रभावी साबित हुई कि अंग्रेजी बोलनेवाले कई देशों में लोगों ने इसे दिलचस्पी से पढ़ा और इस पत्रिका के लिए अन्य देशों से भी भारी रकम चंदे के रूप में आई।

इस तरह बदले में कुछ प्राप्त करने की इच्छा के बिना, अर्पित सेवा से संपादक को उपयोगिता-वृद्धि नियम के तहत अपने निवेश का 500 गुना ज्यादा मुनाफा मिला। कुछ अलग और आगे बढ़कर काम करने की आदत महज कोई सपना नहीं है।

इसका रिटर्न मिलता है और अच्छा रिटर्न मिलता है। यह न भूलें कि अन्य टाइप के निवेशों की तरह कुछ आगे कर गुजरने की आदत ऐसा निवेश है, जिसका लाभांश जीवन भर मिलता रहता है। ऐसे अवसर की उपेक्षा करनेवाले एक अन्य आदमी के साथ क्या हुआ, इसका एक उदाहरण देखिए।

बरसात की एक दुपहरी में एक ऑटोमोबाइल सेल्समैन एक जानी-मानी लग्जरी कार कंपनी की न्यूयॉर्क शाखा के शोरूम में बैठा था। दरवाजा खुला और एक अधेड़ व्यक्ति छड़ी टेकता हुआ अंदर घुसा। सेल्समैन ने दोपहर के अखबार से अपनी नजरें उठाईं और उस आगंतुक की ओर एक बार देखकर दूसरी विंडो की ओर मुखातिब हुआ, क्योंकि वह तत्काल उस तरफ बढ़ गया।

सेल्समैन फिर अखबार में डूब गया। उसने कॉफी की एक सिप ली और अपनी कुरसी से उठने की भी जरूरत नहीं समझी। छड़ी टेकता वह व्यक्ति शोरूम में घूम-घूमकर एक-एक कर कारें देखने लगा। आखिर में वह अखबार में डूबे उस सेल्समैन के पास गया और छड़ी के सहारे खड़े-खड़े तीन अलग-अलग मॉडल की कारों की कीमत पूछी।

अखबार से अपनी आँखें उठाए बिना सेल्समैन ने कीमत बड़बड़ा दी, क्योंकि उसने उस ग्राहक को दूसरे का कीमती समय बरबाद करनेवाला समझा। छड़ी की बदौलत चलते हुए वह ग्राहक फिर शोरूम गया। तीन मॉडलों को गौर से देखकर उनके टायरों को बारी-बारी से चैक किया और वापस सेल्समैन के पास लौटा। उससे बात करने में रुचि नहीं लेनेवाले सेल्समैन से ग्राहक ने कहा- “मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि ये वाली कार खरीदूं, दूसरी वाली लूँ, तीसरी वाली लूँ या तीनों ही कार खरीद लूँ।”

सेल्समैन ने अखबार का अगला पन्ना पलटा और विद्रूप स्वर में कहा—“अवश्य”। छड़ीवाले ग्राहक ने सेल्समैन से कहा—“मैं समझता हूँ कि मैंने तय कर लिया, आप कन्वर्टिबल वाली की सेल्स स्लिप बना दें।” उसके बाद सेल्समैन एलर्ट हो गया, वह अखबार रखकर बाहर निकल आया, तब तक ग्राहक अपनी चेकबुक से एक चेक काटकर सेल्समैन के हाथ में थमा चुका था।

एक पर दस्तखत देखते ही सेल्समैन के चेहरे का रंग फीका पड़ गया और उसे तारे नजर आने लगे। चेक पर नाम वही था, जो फैंसी स्ट्रीट के नीचे स्थित म्यूजियम पर लिखा था।

काफी देर बाद सेल्समैन ने महसूस किया कि अगर उसने थोड़ा आगे बढ़कर पहल की होती, तो आसानी से हेरी पेन विटनी को तीनों कारें बेची जा सकती थीं अच्छी सेवा अर्पित करने की कारोबारी तकनीक थोड़ी महँगी पड़ती है, जो प्रायः लोग देर से समझते हैं।

तकरीबन 40 वर्ष पहले एक अन्य युवा सेल्समैन ने एक हार्डवेयर स्टोर में अपने को उसी बिक गए। स्थिति में पाया। एक मंदे दिन उसने देखा कि स्टोर में कई ऐसे सामान हैं, जिसकी माँग कम हो गई है, क्योंकि वे अब पुराने डिजाइन के हो चुके हैं।

ग्राहक के इंतजार में निठल्ला बैठे रहने के बजाय सेल्समैन ने एक तरकीब निकाल डाली। स्टोर के बीचोबीच उसने एक टेबल खींचा, उस पर वे सारे सामान सजा दिए जिनकी बिक्री मंदी चल रही थी और सब पर अदला-बदलीवाले मूल्य टैग लगा दिए।

सेल्समैन और स्टोर मालिक दोनों को देखकर आश्चर्य हुआ कि सारे सामान हाथों-हाथ हॉट केक की तरह पाँच और दस सेंट स्टोरवाला यह पूरी तरह अमेरिकी कंसेप्ट युवक फ्रैंक डब्ल्यू वूलवर्थ का तात्कालिक आविष्कार था, जिसकी चर्चा किंवदंती के रूप में होती है।

जो कुछ वे कर रहे थे वही था, कुछ आगे बढ़कर कदम उठाना। इसी आइडिए ने उनका भाग्य पलटा और उन्होंने अमेरिकी कारोबार के इतिहास में अपना प्रमुख स्थान बनाया। उस आइडिए ने कई अन्य को भी धनी बनाया और उसने कई रूपों में अमेरिका की मुनाफा देनेवाली व्यापारिक व्यवस्था को प्रभावित किया।

वूलवर्थ को पहल करने के निजी अधिकार का इस्तेमाल करने के लिए किसी ने कहा नहीं था। उसके लिए किसी ने भुगतान भी नहीं किया, लेकिन वूलवर्थ को अपने प्रयासों को लगातार आगे ले जानेवाला रिटर्न मिला। जिसके लिए पैसा मिलता है, उसके अलावा व्यक्तिगत स्तर पर कुछ पहल करने की आदत का रिटर्न मिलता है और ऐसा व्यक्ति सपने में भी उसी के बारे में सोचता रहता है।

जब कोई काम करना शुरू करता है, तो इसका जादुई रिटर्न सुख के रूप में अलादीन के चिराग जैसा मिलता है मानो मदद के लिए जिनों की फौज सोना भरे थैले लेकर आई हो। एक दिन एक अखबार का युवा रिपोर्टर एंड्रयू  dale carnegie से उद्योग जगत् की उनकी उल्लेखनीय उपलब्धियों पर स्टोरी करने उनसे मिलने पहुँचा।

बातचीत के दौरान  dale carnegie ने रिपोर्टर को संकेत दिया कि अगर उसके अंदर 20 वर्षों तक बिना मुनाफे के काम करके कुछ आगे कर गुजरनेवाली सोच है, तो वह भी अपनी किस्मत इस महान् इस्पात मास्टर ( dale carnegie) जैसी बना सकता है।

रिपोर्टर ने चुनौती स्वीकार कर ली और काम शुरू कर दिया। बीस वर्षों के अपने बिना मुनाफावाले श्रम से युवक ने दुनिया को एंड्रयू  dale carnegie वाले धन कमाने के स्टाइल से शुद्ध मुनाफा दिया।

इसके साथ ही उसने लगभग 500 ऐसे लोगों के भी तौर-तरीके सीखे, जिन्होंने कुछ आगे कर गुजरने की तकनीक से धन संग्रह में मदद पहुँचाई। आज वह जानकारी पुस्तक रूप में दुनिया के प्रत्येक अंग्रेजी भाषा-भाषी देश में है और व्यक्तिगत पहल के प्रयोग से उपलब्धि का राज सीखने की इच्छा रखनेवाले लाखों लोगों की मददगार है।

अपने 20 वर्षों की लाभहीन मेहनत का मुआवजा इस पूर्व पत्रकार को आज इतना मिल रहा है, जो उसकी तमाम जरूरतों से ज्यादा है। उसमें सबसे बड़ा है मन की शांति, दुनिया भर में ऐसी दोस्ती जिसकी कीमत नहीं आँकी जा सकती और वैसी खुशी जो किसी को अपना पसंदीदा काम मिलने और उस काम में डूबे रहने में हासिल होती है।

आपको याद होगा कि चार्ल्स एम. शुआब ने शुरुआत एक श्रमिक के रूप में की और वे आगे कुछ कर गुजरने से डरे नहीं। कुछ वर्षों बाद उनकी निजी रेलरोड कार उन्हें पेनसिलवेनिया में विशाल इस्पात कारखाने तक ले गई।

एक सर्द सुबह को शुआब ज्यों ही कार से उतरे, एक व्यक्ति तेजी से उनकी ओर बढ़ा और उनसे कहा कि वह एक इस्पात कंपनी के कार्यालय में सहायक है। उसने कहा कि वो कार देखने और शुआब से मिलने आया है कि कहीं उन्हें मेमो संदेश या ऐसी किसी चीज की जरूरत हो। शुआब ने पूछा—“आपको मुझसे मिलने के लिए किसने कहा?”

“किसी ने नहीं”, युवक ने जवाब दिया, “मैंने आपके आने का नोटिस लगा देखा और मिलने चला आया कि कहीं आपको मेरी किसी सेवा की जरूरत हो।” जरा सोचिए! वह युवक यह सोचकर मिलने आया कि कहीं वैसा कुछ करने का अवसर मिले, जिसके लिए उसे अलग से ज्यादा पैसे नहीं मिलते और उसने किसी के कहे बिना, स्वयं पहल की।

शुआब ने विचारशीलता के लिए विनम्रता से धन्यवाद देते हुए युवक से कहा कि अभी तो उन्हें किसी ऐसी सहायता की जरूरत नहीं है और उस युवक का नाम ठीक से लिखकर अपने काम पर लौटा दिया। उसी रात शुआब की निजी रेलरोड कार जब न्यूयॉर्क शहर पहुँचनेवाली रात की गाड़ी के साथ पहुँची तो साथ में वह युवक भी था।

शुआब के आग्रह पर उस युवक को न्यूयॉर्क में इस्पात बॉस के निजी सहायक का काम दिया गया। विलियम्स नामक वह युवक शुआब की सेवा में कई वर्षों तक रहा और इस दौरान उसे पदोन्नति के अवसर-पर-अवसर मिलते गए। यह थोड़ा अजीब सा लगता है कि कुछ आगे बढ़कर काम करनेवाले व्यवसायी को ऐसे अवसर कम और कैसे मिलेंगे, लेकिन वे हमेशा करें और निश्चयपूर्वक करें।

आखिरकार विलियम्स को वैसा अवसर मिला, जिसे टालना उसके लिए असंभव था। वह अमेरिका की सबसे बड़ी दवा कंपनी का अध्यक्ष और सबसे बड़ा स्टॉक होल्डर बना। यह ऐसा काम था जिससे उसकी किस्मत कल्पना से परे चमकी और अपनी जरूरतों से कई गुना ज्यादा उसने हासिल किया।

यह घटना बताती है कि क्या हो सकता है और इस बात का प्रत्यक्ष उदाहरण है कि अमेरिका की रोजमर्रा की जीवन-शैली में इतने वर्षों से क्या हो रहा है। आपको याद दिलाने की ये उपयुक्त जगह है कि आगे कर गुजरने और जितने काम के पैसे मिलते हैं, उससे ज्यादा करने की आदत से क्या मिलता है।

यह एक विचित्र अनुभव है, जो करनेवाला ही महसूस करता है। इस आदत का सबसे बड़ा लाभ जिसको सेवा अर्पित की जाती है, उसे नहीं मिलता। इससे ज्यादा लाभान्वित सेवा अर्पित करनेवाले होते हैं।

यह सोचने का अंदाज बदल देता है, अन्य लोगों पर उसका प्रभाव बढ़ जाता है, ज्यादा आत्म-निर्भरता आती है, नया उत्साह, नई दृष्टि मिलती है और लक्ष्य की निश्चितता बढ़ जाती है। ये सारे सफल उपलब्धि के गुण हैं।

“काम करेंगे तो अपने में ऊर्जा का अनुभव करेंगे।’ एमर्सन का कहना है, “हाई पावर ऊर्जा—इसके बिना हम दुनिया में कर क्या सकते हैं, लेकिन यह पावर ऐसी होनी चाहिए जो लोगों को आकर्षित करे और लोग इससे चिढ़े नहीं।

यह पावर ऐसी होनी चाहिए जो उपयोगिता वृद्धि के नियम से गति प्राप्त करे और अपने कामों तथा कर्तव्य से इसे कार्यरूप में पाएँ, जो बदले में कई गुना रिटर्न देती है।” वेतनभोगी कर्मचारियों को बुआई और फसल पकने के इस व्यवसाय से ज्यादा सीखना चाहिए।

आप समझेंगे कि अपर्याप्त सेवा का बीज बोकर ज्यादा पैसा देनेवाली खूब अच्छी तरह पकी फसल काटने की उम्मीद क्यों नहीं रखी जा सकती, फिर आप यह भी जानेंगे कि थोड़ा सा काम करके किसी तरह दिन गुजारकर पूरे दिन का वेतन लेने की आदत पर विराम लगना जरूरी है।

जो वेतन के लिए काम नहीं करते और जीवन में कुछ पाने की ख्वाहिश रखते हैं, उनसे मुझे कुछ कहना है। आप अपनी शुरुआत ज्यादा बुद्धिमान् के रूप में क्यों नहीं करते, जो आपकी चाहत पूरी करने का सरल और सटीक तरीका है।

जी हाँ, इसका आसान और निश्चित रिटर्न देनेवाला तरीका यह है कि अपने आत्म को प्रोन्नत करके मन को वह राज हासिल करने की ओर लगाएँ, जो कुछ आगे कर गुजरने की आदतवालों को हासिल हुआ है। यह राज ढंका है और इस पर से परदा अलग से कुछ करने की दिशा में आगे बढ़कर ही उठाया जा सकता है। ‘इंद्रधनुष’ के नीचे रखा सोने का बरतन महज एक परी कथा नहीं है।

कुछ आगे बढ़कर करने का अंत वैसी जगह पर होता है, जहाँ इंद्रधनुष का अंत होता है और वहीं पर सोने का बरतन छिपा है। बहुत कम लोग ‘इंद्रधनुष का अंत’ अभी तक देख पाए हैं। जहाँ पहुँचकर हम सोचने लगते हैं कि अब इंद्रधनुष का अंत हुआ, तभी यह काफी दूर नजर आने लगता है।

हममें से अधिकांश लोगों के साथ दिक्कत यह है कि हम जानते ही नहीं है कि इंद्रधनुष का पीछा कैसे किया जाए। जो इस राज को जानते हैं, उन्हें पता है कि इंद्रधनुष के अंतिम छोर तक अलग से कुछ आगे बढ़कर पहुँचा जा सकता है।

एक दिन तीसरे पहर जनरल मोटर्स के संस्थापक विलियम सी. डूरंट अपने बैंक में बैंक का समय समाप्त होने के बाद घुसे और उन्होंने ऐसे सहयोग की अपेक्षा की जिस पर सामान्यतः बैंक के काम के समय बैंककर्मी ध्यान देते हैं।

जिस व्यक्ति ने विलियम को सहयोग दिया वह था लेसर अधिकारी केरोल डाउनेस। उसने न केवल पूरी कुशलता से विलियम का काम किया, बल्कि एक कदम आगे बढ़कर विलियम डूरंट के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की कि उन्होंने ऐसी सेवा अर्पित करने का अवसर दिया।

उस बैंक अधिकारी ने डूरंट को एहसास करा दिया कि उनके लिए काम करके उसे आनंद की अनुभूति हुई। सुनने में यह कोई ज्यादा महत्त्व की घटना नहीं लगती, लेकिन बैंक अधिकारी को इसका रिर्टन मिला। केरोल डाउनेस जिसे वे जानते भी नहीं थी, उसने सामान्य से अलग हटकर जो सेवा अर्पित की, उसके दूरगामी परिणाम सामने आए, जो सोचकर उसने सेवा नहीं की थी।

अगले दिन डूरंट ने केरोल को अपने कार्यालय में मिलने बुलाया। वे मुलाकात ऐसे प्रस्ताव पर समाप्त हुई, जिसे केरोल ने स्वीकार कर लिया। जनरल मोटर्स में उन्हें एक डेस्क दिया गया, जहाँ कोई 100 के करीब लोग काम कर रहे थे। केरोल को काफी आकर्षक वेतन दिया गया।

काम शुरू करने के पहले ही दिन जब काम समाप्त करने की घंटी बजी तो डाउनेस ने देखा कि सभी लोग जल्दी-जल्दी अपने हैट और कोट उठाकर दरवाजे की ओर भागे और वे अपनी सीट पर बैठे सबके जाने का इंतजार करते रहे।

सबके चले जाने के बाद भी डाउनेस ” अपनी डेस्क पर बैठे सोचते रहे कि हर किसी को ऑफिस का समय समाप्त होते ही सेकंडों में भागने की इतनी जल्दबाजी क्यों थी। 15 मिनट के बाद विलियम डूरंट ने अपने ऑफिस का दरवाजा खोला और डाउनेस को अपने डेस्क पर उस समय भी बैठा देखा।

डूरंट ने पूछा कि क्या उन्होंने समझा नहीं कि 5:30 बजे काम बंद कर देने की सुविधा उन्हें प्राप्त है। डाउनेस ने जवाब दिया–हाँ, क्यों नहीं, लेकिन मैं इस भीड़ में दौड़कर जाना नहीं चाहता था। फिर उसने डूरंट से पूछा कि उसके लायक कोई काम हो तो बताएँ। डूरंट ने डाउनेस से मोटर मैगनेट के लिए एक पेंसिल खोजने को कहा गया। डाउनेस ने पेंसिल उठाई, शार्पनर पर चलाई और डूरंट को दे दी।

डूरंट ने उन्हें धन्यवाद दिया और ‘गुड नाइट’ कहा। अगले दिन भी ऑफिस का टाइम खत्म होने के बाद भागनेवालों की भीड़ छंट जाने के बावजूद डाउनेस अपनी डेस्क पर बैठे रहे, लेकिन आज उनके बैठने के पीछे एक खास लक्ष्य था।

कुछ ही मिनटों में डूरंट अपने निजी ऑफिस कमरे से निकले और फिर डाउनेस से पूछा कि क्या उन्होंने अभी तक नहीं समझा कि 5:30 बजे ऑफिस बंद होने का समय है। “हाँ”, डाउनेस मुसकराए– “मैं समझता हूँ कि यह अन्य लोगों के ऑफिस छोड़ने का वक्त है, लेकिन मैंने किसी के भी मुँह से नहीं सुना कि मुझे समय समाप्त होने के बाद ऑफिस छोड़ देना है, इसलिए मैंने डेस्क पर इस उम्मीद में बैठे रहना पसंद किया कि मैं आपके लिए कोई अलग से काम कर सकूँ।

डूरंट ने कहा—“कैसी असामान्य उम्मीद! आपने यह आइडिया कहाँ से लिया?” डाउनेस का जवाब था—“रोजाना ऑफिस बंद होने के समय जो दृश्य मैंने देखा है, उसी से यह आइडिया लिया।” डूरंट अपने जवाब में कुछ धीमे स्वर में बोले, जो डाउनेस को ठीक से सुनाई नहीं दिया और वे अपने ऑफिस में वापस चले गए।

उसके बाद रोज ही ऐसा हुआ कि ऑफिस बंद होने के बाद डूरंट के निकलने तक वे अपनी डेस्क पर बैठे रहते थे। उन्हें ओवरटाइम का पैसा नहीं मिलता था। किसी ने उन्हें वैसा करने को नहीं कहा था कि देर तक बैठे रहने के एवज में कुछ मिलेगा और कोई भी कैजुअल तरीके से जान सकता था कि वह अपना समय बरबाद कर रहा था।

महीनों बाद डाउनेस को अपने बॉस डूरंट के ऑफिस से बुलावा आया और सूचना दी गई कि हाल में खरीदे गए नए कारखाने में लगाई जानेवाली मशीनरी के सुपरवाइज और इंस्टॉलेशन का काम उन्हें सौंपा गया है। सोचिए, एक पूर्व बैंक अधिकारी चंद महीनों में ही मशीनरी एक्सपर्ट बन गया। बिना किसी हिचकिचाहट के डाउनेस ने जिम्मा स्वीकार कर लिया और अपने काम में जुट गए।

उन्होंने एक बार भी नहीं कहा, “मि. डूरंट, मैं मशीनरी लगाने के बारे में कुछ नहीं जानता।” उन्होंने यह भी नहीं कहा, “यह मेरा काम नहीं है या मुझे मशीनरी इंस्टॉलेशन के लिए कोई भुगतान नहीं दिया गया है।” डाउनेस सुखद अनुभूति लिये अपने नए दायित्व को सँभालने में लग गए।

तीन महीने बाद काम पूरा हो गया। डाउनेस ने इतना बढिया अपना दायित्व पूरा किया कि डूरंट ने अपने ऑफिस में बुलाकर उनसे पूछा कि उन्होंने मशीनरी के बारे में कहाँ से जानकारी हासिल की। “ओहो!” डाउनेस ने यों बयाँ किया–“मैंने यह काम कभी नहीं सीखा मि. डूरंट, मैंने चारों तरफ नजर डाली, वैसे लोगों को खोजा जो मशीनरी लगाना जानते थे, उन्हें काम में लगाया और उन लोगों ने काम निबटाया।”

“शानदार!” मि. डूरंट ने शबाशी दी। दो प्रकार के लोग होते हैं, जो मूल्यवान होते हैं। एक वे होते हैं, जो काम के ज्यादा बोझ की शिकायत किए बिना कुछ करते हैं और अच्छा कर डालते हैं। दूसरे प्रकार के लोग वे होते हैं, जो अन्य लोगों से भी अच्छा काम करा सकते हैं और उन्हें कोई शिकायत नहीं होती।

आप दोनों ही तरह के हुनर में लिपटे एक पैकेज हैं। डाउनेस ने इस उद्गार के लिए मि. डूरंट का शुक्रिया किया और जाने को तैयार हुए। “एक मिनट रुकिए।” डूरंट ने आग्रह किया, “मैं आपको यह बताना तो भूल ही गया कि आपने जो कारखाना स्थापित किया है, आप उसके नए मैनेजर होंगे और अभी जितना वेतन आपको मिल रहा है, उसके दोगुने वेतन से शुरू करेंगे।”

मि. डूरंट के साथ दस साल काम करते हुए केरोल डाउनेस ने 10 से 12 मिलियन डॉलर कमाए, जो उस समय के लिए बहुत बड़ी रकम थी। वे मोटर बादशाह के सबसे नजदीकी सलाहकार हो गए, जिसके परिणामस्वरूप धनकुबेर बन गए।

हम में से बहुतों के साथ असली कठिनाई यह है कि हम पहुँचे हुए की ओर देखते हैं और उसी शान-शौकत के समय के हिसाब से उसके बारे में मूल्यांकन करते हैं, लेकिन यह सोचने का जोखिम नहीं उठाते कि क्यों और कैसे वह व्यक्ति उस मुकाम पर पहुँचा।

केरोल डाउनेस की स्टोरी में कुछ भी नाटकीय नहीं है। जिन घटनाओं का जिक्र किया गया है, वे सब दिन भर के ऑफिस कामकाज का हिस्सा हैं और डाउनेस के साथ काम करनेवाले औसतन लोगों को पता तक नहीं चल पाया।

हमें इस बात पर शक है कि डाउनेस के साथ काम करनेवालों को ईर्ष्या नहीं हुई होगी, क्योंकि वे मानकर चल रहे थे कि उस पर मि. डूरंट की विशेष कृपा है। इसे चाहे तकदीर कहिए या संयोग जो लोग सफल नहीं हो पाए, वे अपनी ही उन्नति में पिछड़ने का बहाना दे रहे हैं।

बेशक मि. डूरंट उस पर कृपालु थे, लेकिन यह कृपा पाने में मि. डाउनेस की स्वयं की पहल ज्यादा मायने रखती है। मि. डाउनेस ने बहुत छोटी सी चीज के जरिए कुछ अलग और आगे बढ़कर काम करने की उत्सुकता दिखाई, पेंसिल अपने बॉस को देते समय वे शार्पनर से उसे नुकीला बनाना नहीं भूले।

उनसे तो सिर्फ पेंसिल माँगी गई थी। मि. डाउनेस ने कुछ उम्मीद में अपने डेस्क पर बैठे रहकर ऐसी स्थिति बनाई कि 5:30 बजे शाम को भीड़ खत्म होने के बाद अपने बॉस का कोई काम वे कर सकें।

डाउनेस ने निजी पहल के अधिकार का इस्तेमाल करके वैसे लोग खोजे, जो मशीन इंस्टॉल करना जानते थे। मि. डूरंट से उन्होंने नहीं पूछा कि ऐसे लोग उन्हें कहाँ और कैसे मिलेंगे। इस पूरे घटनाक्रम पर कदम-दर-कदम गौर करते चलें तो आप पाएँगे कि डाउनेस को Success पूरी तरह अपनी पहल से मिली।

इस स्टोरी की शुरुआत एक छोटा सा काम सार्थक मनोवृत्ति के साथ अच्छी तरह पूरा करने से हुई है। डूरंट की कंपनी में काम कर रहे तकरीबन 100 अन्य लोग भी थे, जो डाउनेस की तरह ही अच्छी तरह वह काम पूरा कर सकते थे, लेकिन उनके साथ दिक्कत यह थी कि वे 5:30 बजे की भीड़ में तेजी से ऑफिस से भागते हुए इंद्रधनुष का अंत खोज रहे थे।

वर्षों बाद केरोल डाउनेस के एक मित्र ने उनसे पूछा कि उन्हें डूरंट की कृपा पाने का अवसर कैसे मिला। डाउनेस ने बिलकुल सहज भाव से जवाब दिया—“ओहो, मैंने अपना काम इस तरह से किया, ताकि उनकी नजर में आऊँ और वे मुझे काम पर मुस्तैद देखें।

डूरंट ने जब अपने चारों तरफ देखा, तो अकेला मैं ही था, जो उनका कोई छोटा सा काम भी करने को तत्पर था। फिर जब समय आया तो मि. डूरंट मुझे नियमित रूप से बुलाने लगे।” डाउनेस की इस युक्ति पर ध्यान दें कि डूरंट उन्हें नियमित रूप से बुलाने लगे, उन्हें डाउनेस को बुलाने की आदत पड़ गई।

उन्होंने देखा कि डाउनेस के पास कुछ आगे बढ़कर करने की लगन और वैसी जवाबदेही सँभालने का हुनर है। इतनी दयनीय स्थिति है कि सारे अमेरिकी लोगों में बड़ी जवाबदेही लेने का वैसा उत्साह नहीं है। उतनी ही दयनीय स्थिति यह भी है कि हममें से ज्यादातर लोग उन सुविधाओं के बारे में ज्यादा नहीं बोलते जो अमेरिकी जीवन-शैली में उपलब्ध है, बल्कि उलटे अवसरों की कमी की बात ज्यादा करते हैं।

अमेरिका में रहनेवाला कोई व्यक्ति क्या गंभीरता से यह दावा कर सकता है कि डाउनेस को अगर कानूनन 5:30 बजे कार्यालय का काम खत्म होने के बाद भीड़ के साथ कार्यालय छोड़ने को मजबूर किया जाता, तो वे ज्यादा अच्छा कर सकते थे?

अगर वे ऐसा करते तो वही सामान्य वेतन पर औसत काम निपटाकर दिन गुजार देनेवाला बने रह जाते। उन्हें उससे ज्यादा कुछ हासिल नहीं हो पाता। उन्हें ज्यादा आखिर क्यों मिला? डाउनेस की किस्मत उनके अपने हाथों में थी।

वह इस एकमात्र सुविधा में लिपटी थी, जो हर अमेरिकी नागरिक की सुविधा होनी चाहिए। निजी पहल के अपने अधिकार का इस्तेमाल करके उन्होंने हमेशा एक कदम आगे बढ़कर काम करने की आदत डाली। यही पूरी कहानी का सार है। डाउनेस की Success का दूसरा कोई राज नहीं है।

वे इस बात को स्वीकारते हैं और गरीब से अमीर बनने की उनकी परिस्थितियों से परिचित हर कोई इस बात को जानता है। एक ही चीज है, जो लगता है कोई नहीं जानता! ऐसा क्यों है कि केरोल डाउनेस सरीखे कुछ ही महिलाएँ और पुरुष हैं, जो अपने अंदर की इस शक्ति को खोजते हैं कि जितने काम का पैसा मिलता है, उससे ज्यादा करें।

सारी बड़ी उपलब्धि का बीज इसमें छिपा है। यही उल्लेखनीय Success का राज है, लेकिन इसे इतना कम समझा गया है कि अधिकांश लोगों को इसमें कोई चालाकी नजर आती है, जिसके जरिए कंपनी मालिक अपने कर्मचारियों से ज्यादा काम लेने की कोशिश करते हैं।

एक कदम आगे बढ़कर काम करने की आदत पर उत्साह बड़े ही नाटकीय अंदाज में ‘वाइजएकर’ ने व्यक्त किया है, जिन्होंने हेनरी फोर्ड के पास कभी नौकरी के लिए आवेदन भेजा था। फोर्ड ने उनके अनुभव, आदतों तथा दैनिक कार्यकलापों के बारे में पूछा और उनके जवाबों से संतुष्ट हो गए।

उसके बाद हेनरी फोर्ड ने उनसे पूछा—अपनी सेवा के लिए आप कितने पैसे चाहते हैं? वाइजएकर इस सवाल का जवाब देने से कतरा रहे थे। आखिरकार फोर्ड ने ही कहा सोचें कि अपना काम शुरू करने के बाद, जितना कर सकते थे किया और उतने काम के पैसे देकर हमने आपको विदा कर दिया।

मि. वाइजएकर ने तब जवाब दिया—अभी मैं जहाँ काम कर रहा हूँ, वहाँ काम से ज्यादा पैसे मिल रहे हैं। और हमें इसमें संदेह नहीं कि उसने सच बोला। इससे जाहिर हो जाता है कि क्यों कई लोग जीवन में आगे नहीं बढ़ पाते हैं। वे जितने काम के लायक हैं, उससे ज्यादा पैसे पा रहे हैं।

वे हैं कहाँ! अपने को ज्यादा काबिल बनाकर जीवन में आगे बढ़ने का हुनर वैसे लोग कभी नहीं सीखते। मैककिनले ने स्पेन-अमेरिका युद्ध के दौरान एक युवा सैनिक रोवान को अमेरिकी सरकार का संदेश लेकर विद्रोही नेता गार्सिया के पास जाने को कहा, जिसका सही अता-पता कोई नहीं जानता था।

युवा सैनिक ने संदेश लिया और क्यूबा के जंगलों में भटकते-भटकते आखिर में गार्सिया का ठिकाना खोजा और राष्ट्रपति का संदेश उसके हाथ में सौंपा। इस कहानी का संदेश यही है कि एक निजी सैनिक ने भारी दिक्कतों के बावजूद वह काम पूरा किया, जो उसे सौंपा गया था और कोई बहाना लेकर काम अधूरा छोड़कर नहीं लौटा।

यह कहानी कल्पनाओं को भेदती दुनिया भर में फैली। एक युवक को जो काम सौंपा गया, उसे अच्छी तरह पूरा करना हर जगह खुशियों का समाचार बना। गार्सिया की यह संदेश-कहानी बुकलेट के रूप में छपी और उस समय के किसी भी प्रकाशन से ज्यादा अर्थात् 1 करोड़ से ज्यादा प्रतियाँ छपी। यही एक कहानी लिखकर उसके लेखक ने नाम भी कमाया और पैसा भी।

यह कहानी इसलिए लोकप्रिय हुई, क्योंकि इसमें कुछ ऐसी जादुई शक्ति थी, जो विरले ही देखने को मिलती है। पूरे विश्व को ऐसे विरले की तलाश है जिसने कुछ किया और अच्छी तरह किया।

वे हर क्षेत्र में ऐसा चाहते हैं और उन्हें इसकी जरूरत है। अमेरिकी उद्योग वैसे लोगों को राजकुमार की तरह बिठाता है, जो इस तरह की जिम्मेदारी लें और एक कदम आगे चलने की मनोवृत्तिवाली सही सोच के साथ उसे निभाएँ।

एंड्रयू  dale carnegie ने ऐसे चालीस लोगों को उठाया, जिनमें चार्ल्स शुआब भी थे और उन्हें दिहाड़ी मजदूर से करोड़पति की कुरसी पर बिठा दिया। उन्होंने कुछ आगे बढ़कर काम करनेवालों की कीमत समझी।  dale carnegie को जहाँ कहीं भी ऐसे लोग नजर आए, उन्हें तुरंत अपनी खोजवाली फाइल की सूची में डाला, जो उनके व्यवसाय के अंदरूनी मामलों का एक हिस्सा थी।

ऐसे व्यक्तियों को  dale carnegie ने वे अवसर दिए, ताकि उन्हें उनकी कीमत के मुताबिक रिटर्न मिले। चार्ल्स शुआब ने  dale carnegie की कंपनी में दिहाड़ी मजदूरी पर ड्राइवर के रूप में काम शुरू किया था, लेकिन धीरे-धीरे वे ऊँचाई की सीढियाँ चढ़ते गए और  dale carnegie के दाहिने हाथ बन गए।

लोगों के कोई काम करने या उससे मुकरने के पीछे एक खास लक्ष्य काम कर रहा होता है। सबसे बेहतरीन लक्ष्य कुछ आगे बढ़कर काम करने की आदतवालों का होता है और इसकी उपज इतनी तरह के लाभांश के रूप में सामने आती हैं, जो ऐसी सोच रखनेवाले ही समझ सकते हैं।

अभी तक ऐसे किसी व्यक्ति को मेरी जानकारी में स्थायी Success नहीं मिली है, जिसने ठीक पैसे के बराबर काम करने के बजाय कुछ आगे बढ़कर काम न किया हो। ऐसे अभ्यास के प्रत्यक्ष प्रमाण प्रकृति के नियम-कायदे हैं। एक कदम आगे चलने के अभ्यासियों का प्रकृति भी साथ देती है।

यह सामान्य समझ और न्याय पर आधारित है। इस motivation law की बेहतरीन परख का सबसे अच्छा उपाय यह है कि रोजमर्रा के काम से जोड़कर इसे दैनिक आदतों का एक हिस्सा बनाएँ। इसके कुछ सत्य तो हम काम के अनुभव से सीख सकते हैं।

कुछ लोग कहेंगे- जितने पैसे मिलते हैं, उससे ज्यादा काम मैं पहले से कर रहा हूँ, लेकिन मेरा मालिक इतना स्वार्थी और लालची है कि जो सेवा मैं अर्पित करता हूँ, उसका नोटिस ही नहीं लेता। हम सब जानते हैं कि ऐसे लालची लोग हैं, जो जितने काम के पैसे वे देते हैं, उससे ज्यादा काम चाहते हैं।

स्वार्थी मालिक वैसे ही हैं जैसे कुम्हार के हाथ में मिट्टी का लोंदा। उनके लालच के जरिए उन्हें इस स्थिति में लाया जा सकता है, ताकि वे वैसे लोगों को इनाम देने को विवश हों जो ज्यादा काम करते हैं। लालची मालिक कभी नहीं चाहते कि वेतन की परवाह किए बगैर कुछ आगे बढ़कर काम करने की आदतवाले नौकरी छोड़कर जाएँ।

वैसे कर्मचारियों की कीमत वे जानते हैं और यही वह बिंदु है, जहाँ अपनी चतुराई और बुद्धिकौशल से लालची मालिकों को ढीला पड़ने को विवश किया जा सकता है। चतुर कर्मचारी ऐसे मालिकों की सोच बदलने के लिए जान-बूझकर अन्य कर्मचारियों की अपेक्षा ज्यादा और बेहतर काम करेगा।

लालची मालिक ऐसे कर्मचारियों को पकड़कर रखने के लिए वहाँ तक झुकने को तैयार हो जाएगा, ताकि वे काम छोड़कर न जाएँ। इस तरह मालिकों का लालच ही एक कदम आगे बढ़कर काम करनेवालों के लिए एक बड़ी संपत्ति हो जाएगा।

इस तकनीक का असर हमने सैकड़ों बार देखा है, जिससे मालिकों को लालचवाली अपनी ही कमजोरी के आगे झुककर मानसिकता बदलनी पड़ी है। एक बार भी मैंने इस तकनीक को असफल होते नहीं देखा। कभी-कभी ऐसा भी हुआ है कि लालची मालिक उम्मीद के अनुरूप जल्दी एक्शन में नहीं आते, लेकिन यह उन्हीं के लिए दुर्भाग्यपूर्ण साबित हुआ, क्योंकि ऐसा करके वह मालिक अपने प्रतियोगी मालिक को वैसे काबिल कर्मचारियों को तोड़ने का न्योता देता है।

कुछ आगे बढ़कर काम करने की आदतवालों को धोखा देने का कोई रास्ता नहीं है। अगर एक सूत्र से उनके काम को मान्यता नहीं मिलती, तो दूसरे सूत्र से मिलती ही है और प्रायः उस रूप में जिसकी उम्मीद भी नहीं रहती। एक कदम आगे बढ़कर सही मानसिक वृत्ति से काम करनेवाले नौकरी खोजने में कभी समय नहीं गँवाते।

वे नौकरी की तलाश में हाथ-पर-हाथ धरे बैठे नहीं रहते। निराशा आती है, जाती है, काम खराब हो या अच्छा, देश में शांति हो या युद्ध वे लोग वेतन से ज्यादा काम बेहतर प्रदर्शन के साथ करते रहते हैं, ताकि उनकी खपत हमेशा रहे, वे अपने लिए रोजगार सुनिश्चित कर लेते हैं।

ऊँचा वेतन और कभी खत्म न होनेवाला हुनर जुड़वाँ बहनें हैं। ये हमेशा साथ चलती हैं और साथ चलेंगी। कुछ आगे बढ़कर काम करने का परिणाम पूर्ण व्यावसायिक सोच के रूप में सामने आता है, जो व्यक्तिगत समृद्धि के साथ-साथ कारोबार में भी समृद्धि देता है।

एक कदम आगे बढ़कर काम करना अच्छी कारोबारी सोच कई कंपनियों ने कुछ आगे बढ़कर काम करने की सोच को कंपनी का मिशन बनाया है। हमारी एक लोकप्रिय एयरलाइंस ऐसी ही एक कंपनी है। इस एयरलाइंस के संस्थापक ने सारा कुछ सही दिशा में किया जिसके चलते आज यह कंपनी उस रूप में जानी जाती है, जिसमें योगदान करने के इच्छुक आवेदकों की लंबी सूची रहती है।

इस कंपनी की Success का सबसे प्रमुख लक्षण है, ग्राहकों को आकर्षित करनेवाला कर्मचारियों का व्यवहार। खुद संस्थापक का कहना है—मैं समझता हूँ कि यह सरल जैसा लगता है, लेकिन हमेशा कहता हूँ कि सेवा के स्वर्णिम नियम का पालन करो।

दूसरों की सेवा वैसे ही करो, जैसी सेवा की उम्मीद आप दूसरों से करते हो। मैं अपने लोगों से कहता हूँ, अगर आप किसी रेस्तराँ या डिपार्टमेंटल स्टोर में जाएँ और काउंटर पर खड़ा सेल्समैन कायदे से बात न करे, आपकी जरूरतों की परवाह न करे तो आपको कैसा लगेगा? हर कोई इस सवाल के जवाब में कहेगा नहीं हम इसे पसंद नहीं करेंगे।

उसके बाद मैं कहता हूँ, चिड़चिड़ा मत बनो। अच्छी और ऐसी सेवा अर्पित करो, जैसी सेवा आप किसी से पाना चाहते हो। कहानी एडवर्ड चोएट की कुछ लोग स्मार्ट होते हैं, कुछ अन्य बुद्धिमान होते हैं। ऐसे ही लोगों की खोज है, वित्तीय लाभ के लिए कुछ आगे बढ़कर काम करने का motivation law जिसे अपनाकर धनकुबेर बना जा सकता है।

इसमें जो वाकई बुद्धिमान् हैं, वे मानते हैं कि इस motivation law का सबसे बड़ा फायदा दोस्ती के रूप में मिलता है, जो जीवन भर साथ चलता है। चाहे मानवीय संबंध में समरसता, प्रेम का निर्वहन, लोगों को जानने-समझने की क्षमता हो या आपस में दुआएँ बाँटने की इच्छा, इन तमाम बातों में एक कदम आगे बढ़कर काम करने की आदत का लाभ मिलता है और यह कुल मिलाकर धनकुबेर बनने के बारह उपाय की राह दिखाते हैं।

एडवर्ड चोएट वैसे व्यक्तियों में से एक थे, जिन्होंने इस सत्य को पहचाना और सुपर अमीर बनने की मास्टर चाबी हासिल की। वे लॉस एंजिल्स, कैलिफोर्निया में रहते थे और बीमा कंपनी के एजेंट थे। अपने कॅरियर की शुरुआत एडवर्ड ने जीवन बीमा सेल्समैन के रूप में की और अपने प्रयासों से अच्छा जीवनयापन करने लगे, लेकिन उन्होंने उस क्षेत्र में कोई रिकॉर्ड नहीं बनाया।

दुर्भाग्य से एडवर्ड अपनी सारी पूँजी से हाथ धो बैठे और सबसे निचले पायदान पर आ गए। हालत ये हो गई कि एडवर्ड को मजबूरन नए सिरे से जिंदगी शुरू करनी पड़ी, जो बिलकुल दुर्भाग्यपूर्ण व्यावसायिक शुरुआत साबित हुई।

मैंने इसे एक दुर्भाग्यपूर्ण व्यावसायिक शुरुआत कहा, मगर दरअसल मुझे सौभाग्यशाली व्यावसायिक शुरुआत कहना चाहिए। नुकसान ने एडवर्ड को थोड़ा रुककर यह सोचने, सुनने, देखने और इस बात पर मन एकाग्र करने को विवश किया कि क्यों किस्मत कुछ को उपलब्धि के ऊँचे पायदान पर ले जाकर खड़ा कर देती है, पर अन्य को अस्थायी हार या स्थायी विफलता की हालत में ला देती है।

चित्त और मन को एकाग्र करके वे व्यक्तिगत उपलब्धि दर्शन के छात्र बन गए, जिसमें एंड्रयू  dale carnegie ने मदद करके एडवर्ड को रँगारंग कॅरियर उपलब्ध कराया। एडवर्ड जब कुछ आगे बढ़कर काम करने के पाठ तक पहुँचे तो दृढ़ लगनवाली अंडरस्टैंडिंग की भावना ने उनकी चेतना जगाई, जिसका अनुभव उन्होंने पहले नहीं किया था।

एडवर्ड ने महसूस किया कि भौतिक सुखों की क्षति उससे ज्यादा बड़े सुख की ओर ले जाती है, जिसमें आध्यात्मिक शक्ति की भी प्रमुख भूमिका होती है। इस खोज के बाद एडवर्ड ने धनकुबेर के बारह उपाय एक-एक करके आजमाने शुरू कर दिए।

सार्थक मानसिक मनोवृत्ति के Success से उन्होंने शुरुआत की। कुछ समय के लिए एडवर्ड ने यह सोचना बंद कर दिया कि वे फिर से जीवन बीमा एजेंट का काम शुरू कर सकते हैं।

इसके बजाय एडवर्ड ऐसे अवसरों की तलाश में जुट गए, जिसमें उन लोगों की सेवा की जाए, जो समस्याओं के बोझ से परेशान रहते हैं और उनका समाधान नहीं निकाल पाते। ऐसी सेवा का पहला मौका एडवर्ड को कैलिफोर्निया के ही रेगिस्तान में मिला, जहाँ एक युवक खनन व्यवसाय में असफल होकर भुखमरी का शिकार था।

एडवर्ड उस युवक को अपने घर ले गए, उसे खिलाया और हौसला बढ़ाया। उन्होंने युवक को तब तक अपने घर में रखा, जब तक वह अपने लिए बेहतर मानसिक स्थिति में नहीं आ गया। एक अच्छे परोपकारी की भूमिका में आने के बाद एडवर्ड के दिमाग से वित्तीय मुनाफा कमाने की बात निकल गई।

स्पष्ट था कि गरीब, हतोत्साहित युवक कहाँ से बीमा एजेंसी खरीद पाता। उसके बाद एडवर्ड के सामने फूटी किस्मतवालों की किस्मत सँवारने के इतने अवसर धड़ाधड़ आने लगे कि उनका व्यक्तित्व एक युवक जैसा हो गया, जो कठिन समस्याओं से ग्रस्त लोगों को समाधान खोजने के लिए अपनी ओर आकर्षित करने लगा।

यह एडवर्ड की राह में धोखे जैसा था। क्योंकि वे अपने को ठगने लायक बनाने के प्रयोग में लगे थे कि देखें, दूसरों की मदद करने का लक्ष्य वे कितने मनोयोग से हासिल कर सकते हैं।

हम यह न भूलें कि एक कदम आगे बढ़कर काम करने के motivation law पर चलनेवाले प्रत्येक व्यक्ति को किसी-न-किसी रूप में एक खास समय का अनुभव अवश्य होता है। उसके बाद दृश्य बदला और एडवर्ड चोएट की किस्मत ने ऐसा मोड़ लिया जिसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी।

उनके बीमा कंपनी व्यवसाय में दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ोतरी होने लगी। जीवन बीमा की बिक्री रातोरात चमक उठी। चमत्कार-पर-चमत्कार सामने आने लगे और एडवर्ड का कारोबार उनकी उम्मीद से कई गुना ज्यादा चमका।

कमाल तो यह रहा कि उस समय तक की सबसे बड़ी बीमा पॉलिसी उस हतोत्साहित युवक के मालिक ने खरीदी, जिसकी उन्होंने परेशानी की हालत में मदद करके रेगिस्तानी निराशा से निजात दिलाई और दोस्ताना संबंध कायम किए थे।

इसके लिए एडवर्ड को खुद कोई प्रयास नहीं करना पड़ा। अन्य पॉलिसी की बिक्री भी उसी तरह होने लगी और जिस काम के लिए पहले काफी दौड़ना पड़ता था, कठिन मेहनत करनी पड़ती थी, वे सब आसानी से होने लगे, फिर वे बीमा विशेषज्ञ के रूप में मशहूर हो गए।

बड़ी-बड़ी वित्तीय जिम्मेदारियाँ सँभालनेवाले और कॉरपोरेट सेक्टर के लोग अपनी जीवन बीमा समस्याओं के लिए एडवर्ड से परामर्श करने लगे। जल्द ही एडवर्ड ने अपने समय के सभी जीवन बीमा एजेंटों को दौड़ में पीछे छोड़ दिया, जिसके एवज में उन्हें मिलियन डॉलर राउंड टेबल की आजीवन सदस्यता प्राप्त हुई।

ऐसा ओहदा सिर्फ ऐसे व्यक्तियों को हासिल होता है, जो लगातार तीन वर्ष तक सालाना दस लाख डॉलर के बीमा बेचने का रिकॉर्ड बना चुके हों। एडवर्ड से पहले उस समय तक यह उल्लेखनीय खिताब पानेवाले मात्र 57 लोग थे। इस तरह आध्यात्मिक सुख हासिल करने के बाद एडवर्ड ने भौतिक सुख भी पाया और इतनी प्रभुता से पाया, जो उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था।

छह साल तक परोपकारी की भूमिका निभाने के बाद एडवर्ड के भाग्य ने ऐसा पलटा खाया कि साल के पहले चार महीनों में ही उन्होंने बीस लाख डॉलर से ज्यादा की जीवन बीमा पॉलिसी बेचीं। एडवर्ड की उपलब्धियों की कहानी पूरे देश में फैलने लगीं।

उसके बाद एडवर्ड को जीवन बीमा सम्मेलनों में व्याख्यान देने के बुलावे आने लगे। सम्मेलनों में जुटनेवाले जीवन बीमा एजेंट यह जानने को उत्सुक थे कि कैसे एडवर्ड ने इस व्यवसाय के शिखर तक की सीढियाँ तय की अन्य सफल लोगों के सामान्य तरीके के ठीक विपरीत एडवर्ड ने सम्मेलन में भाग लेनेवालों को शुद्ध और निर्मल मन की महत्ता बताई, जिससे वे उत्प्रेरित हुए।

एडवर्ड ने स्पष्ट रूप में स्वीकारा कि उनकी उपलब्धि दूसरे के दर्शन अपनाने और सहयोग देने की भावना से काम करने का परिणाम है। प्रायः सफल लोग अपनी Success की डींगें हाँककर श्रोताओं को यह समझाने की कोशिश करते हैं कि उन्होंने यह सारा कुछ अपनी स्मार्टनेस और बुद्धिकौशल से हासिल किया है।

वे अपने गुरुजन तथा प्रेरणा देनेवालों को इसका श्रेय नहीं देते। मैं आप सभी के सामने स्पष्ट कर दूं कि कोई भी व्यक्ति Success के ऊँचे शिखर तक अन्य लोगों के मैत्रीपूर्ण सहयोग के बगैर नहीं पहुंच पाया, न ही दूसरों की मदद किए बिना किसी को मन मुताबिक Success मिली।

एडवर्ड चोएट ने वांछित भौतिक सुख हासिल किए। आध्यात्मिक सुख में भी वे काफी आगे थे, जिसका बौद्धिक इस्तेमाल करके उन्होंने सही मायने में धनकुबेर के बारहों सोपान पूरे किए, जहाँ पैसा अंतिम और कम महत्त्ववाला बिंदु है।     

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